सहयोगी जीवों का पालन

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सहयोगी जीवों का पालन

रासायनिक खाद व कीटनाशक के प्रयोग से खेती की यह श्रृंखला भी टूट गयी, परिणाम सबके सामने है। पहले खेतों में जो अन्न पैदा होता था उसे हम खाते थे, भूसा या चारा पशुओं को दिया जाता था। फसल उगाने के दौरान अनेक कीट व पक्षी भी अपना भोजन प्राप्त कर लेते थे। कई पक्षी फसल पर लगने वाले कीट को खाते थे। मधुमक्खी मकरन्द भी लेती थी ओर परागकण भी करती थी जिसके फल अच्छे बनते थे।यह आज का विज्ञान भी मानता है। किन्तु गोबर की खाद की जगह रासायनिक उर्वरक डालने से आधा चक्र टुटा शेष आधा चक्र कीटनाशकों के प्रयोग से टूट गया। जिससे कई लाभदायक कीट व पक्षी इन जहरीली दवाओं के कारण या तो तारे जाते हैं या खेत में आते ही नहीं हैं।अब जब हमने खेती करना प्रकृति से छीनकर अपने हाथ में ले लिया है तो यूरिया के उपयोग के बाद अब सभी पोषक तत्वों के बीच संतुलन बनाना हमारा काम हो गया किन्तु पिछले २०-३० साल में भूमि में बढ़ता पोषक तत्वों के बीच असंतुलन और दवाई छिड़कने के बावजूद बढ़ते कीट रोग यह बता रहे हैं कि हम इस व्यवस्था का प्रबंध ठीक तरह से नहीं कर पाये हैं। अतः सबसे बढ़िया उपाय यही हैं कि पुनः प्राकृतिक व्यवस्था को विज्ञान कि नई समझ से मिलाकर उपयोग में किया जाए। जिसमें खाद- दवाई कि लागत नहीं होगी,पर्यावरण में कोई नुकसान नहीं होगा और जैविक कचरे का अच्छा प्रबंध होगा तब साथ ही हिंसक खेती से अहिंसक खेती की तरफ जाने का रास्ता मिल जाएगा। इस प्रक्रिया से सबसे पहले लाभदायक पशुओं को शामिल करना जरुरी है।
खेती के साथ पशुपालन :-
खेती में जैविक खाद, जल के बाद दूसरी आवश्यकता है जिसे पशुपालन से बहुत अच्छी तरह नियमित रूप से बनाया जा सकता है। पशु मुख्यतः गाय,भैंस आदि फसल अवशेष का सदुपयोग करके अपशिष्ठ के रूप में गोबर प्रदान करते हैं जिसे बायोगैस संयत्र ७-१५ दिन में स्लरी खाद ले सकते हैं। पशु मूत्र भी नत्रजन का अच्छा स्त्रोत हैं तथा गाय का मूत्र, फसलों के रोग-कीट नियंत्रण में भी बहुत उपयोगी है। फसल चक्र में चौथे वर्ष भूमि पर पशुपालन, भूमि की उर्वरता बढ़ाने में बहुत सहायक होता है। बैल से जुताई टैक्टर की अपेक्षा कई गुना सस्ती पड़ती है।
पक्षी पालन :-
आजकल अधिकांश लोग यह मानते हैं कि पक्षी फसल को नुकसान करते हैं जबकि सच्चाई यह है कि हम कीटनाशकों का प्रयोग कर जब कीट मार डालते हैं तो पक्षियों को भूख मिटाने के लिए अनाज ही दिखता है अन्यथा अधिकांश पक्षियों का ९०-९५% भोजन का हिस्सा कीट ही होते हैं। फसल के पास छोटी खूटियां गाढ़ देने से कई प्रकार कि चिड़ियां उन पर बैठ कर फसल के कीट खा जाती हैं। इसी प्रकार उल्लू की एक जाति(बार्न उल्लू) वर्ष में १६०० चूहे तक खा जाता है।
मछली पालन :-
जहां पानी की उपलब्धता अधिक होती है और धान की खेती की जाती है वहां मछली पालन बहुत उपयोगी होती है। मछलियां धान पर लगने वाले कीटों के लार्वा खा जाती हैं साथ ही खाद का सदुपयोग भी करती है। मछली पालन के साथ बतख पालन और सूअर पालन भी धान की खेती के साथ किया जा सकता है।
मधुमक्खी पालन :-
मधुमक्खी का स्थान लाभदायक कीटों की श्रेणी में सबसे ऊपर है क्योंकि ये परागण करके अच्छे फल बीज बनने में महत्वपूर्ण योगदान देती है और फसलों को कई तरह की बीमारियों से बचाती है। इसके साथ ही शहद, रायल जैली,मोम आदि उपयोगी पदार्थ बनाती है। जिनकी बाजार में मांग अच्छी रहती है। रासायनिक खेती से पहले मधुमक्खी खेत का एक प्राकृतिक अंग होती थी। सभी घरों के बहार आधे टूटे मटके में पानी भरकर लोग रखते थे जिससे मधुमक्खी व चिड़ियां अपनी प्यास बुझाती थी और अनजाने में ही मधुमक्खी पालन होता रहता है। जब कीटनाशकों के छिड़काव से या तो मधुमक्खी जहरीले हुए मकरन्द को खाकर मार जाती है या कीटनाशकों की दुर्गन्ध के कारण खेत में आती ही नहीं है।
उदाहरण के लिए मधुमक्खी पालन वैसे तो पालतू मधुमक्खी को लकड़ी की पेटी में रखकर पाला जा सकता है किन्तु यदि खेत में कुछ वृक्ष व पानी की व्यवस्था हो तो जंगली मधुमक्खी वहां आकर अपनी सेवाएं दे सकती हैं।

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