मुर्गीपालन व्यवसाय

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मुर्गीपालन व्यवसाय

मुर्गीपालन लाभदायक व्यवसाय :
मुर्गीपालन को एक लाभदायक धंधे के रूप में तभी सफल बनाया जा सकता है जब आपके पास उसकी आवश्यक तकनीकी जानकारी व व्यावहारिक अनुभव हो। पहली बार व्यवसाय आरम्भ करने के लिए तकनीकी जानकारी होना जरुरी है। आप किसी अनुभवी मुर्गीपालन से व्यावहारिक जानकारी प्राप्त करें। प्रशिक्षण तथा परामर्श से आपको पता चलेगा कि मुर्गी फार्म कैसा हो, चूजे दाना कैसे बनाया जाये, दाना-पानी का बर्तन कैसा हो, मुर्गियों का रख-रखाव कैसे करें तथा बिमारियों से बचाने के लिए क्या-क्या आवश्यक उपाय किये जायें?
आहार प्रबन्धन : हमारे देश में कुक्कुट पालन एक औघोगिक चरण में पहुँच चूका है जिसमें व्यावसायिक एवं आर्थिक व्यवहारिकता की महत्वपूर्ण भूमिका है। कुक्कुट पालन के कुल खर्च का ७५-८०% हिस्सा उसके आहार पर ही लगता है। कुक्कुट आहार के संघटको की बढ़ती कीमत इस उद्योग के विकास में एक गंभीर समस्या है। उत्पादन लागत में कमी के सभी प्रयास इस कीमत वृध्दि के कारण बेकार हो जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि सस्ते संघटकों एवं उनके उपोत्पादों को प्रयोग पर पोषण तत्वों कि आपूर्ति करने के प्रयास किये जायें।
मुर्गियों के आहार में मुख्य घटक के रूप में खाद्द अनाजों व कम रेशेदार दाने के होना जरुरी है। ये खाद्द पदार्थ बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए भी चाहिये क्योंकि हमारे देश में अनाज का उत्पादन बहुत अधिक नहीं है जिसे कि मुर्गियों के लिए प्रयोग किया जा सके।इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि मुर्गियों के लिए प्रयोग किया जा सके। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि आहारों के निर्माण में अनाजों एवं परम्परागत प्रोटीन के स्त्रोत उत्पादों कि जगह सस्ते कृषि एवं औघोगिम उपोत्पादों का प्रयोग करें।लेकिन आहार निर्माण से पहले यह जानकारी अत्यावश्यक है कि इन उपोत्पादों को किस सीमा/स्तर तक बिना किसी नुकसान के कुक्कुट आहार में मिलाया जा सकता है।
मुर्गीपालन पर होने वाले कुल खर्च का दो-तिहाई खर्च उनको खिलाने के लिए ख़रीदे गये दानों पर होता है। अतः अपने इलाके में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के खाद्द पदार्थो को सही मात्रा व उचित अनुपात में मिलकर संतुलित दाना मिश्रण बनायें तो वह सस्ता होगा। संतुलित दाना मिश्रण विभिन्न प्रकार के अनाज जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा, गेहूँ आदि खल; जैसे-मूंगफली की खल, तिल की खल, सूर्यमुखी की खल, सोयाबीन की खल, सरसों की खल आदि, चुरी: खनिज मिश्रण एवं विटामिन आदि को सही मात्रा व उचित अनुपात में मिलाकर बनाया जाता है। इस तरह के संतुलित आहार से मुर्गियों को सभी पोषक तत्व; जैसे- प्रोटीन, ऊर्जा, खनिज, विटामिन आदि उनके जरुरत के मुताबिक प्राप्त होगा जिससे उनके शारीरिक विकास व उत्पादन में वृध्दि होगी। यानि आप जल्द से जल्द कम खर्च में ज्यादा मांस व अंडे का उत्पादन कर सकते हैं। चूँकि, आहार की मात्रा एवं गुणों का प्रभाव मुर्गियों द्वारा मांस व अण्डों के उत्पादन पर पड़ता हैं, अतः इन्हें कम लागत वाला संतुलित आहार उचित मात्रा में देकर ही ज्यादा से ज्यादा फायदा लिया जा सकता है।
इसलिए चूजों व मुर्गे-मुर्गियों का आहार बनाना और खिलाने पर ही धंधे का फायदा या नुकसान निर्भर करेगा। आहार आप खुद ही बनायें। छोटे मुर्गी पालक हाथ से मिलाकर एवं बड़े मुर्गीपालक मशीनों के द्वारा खुद ही दाना तैयार करें। छोटे चूजों के लिए बारीक़ दाना एवं बड़े चूजों के लिए मोटा दाना ठीक होगा। चूजों को हमेशा पर्याप्त मात्रा में दाना उपलब्ध कराएं। दाने का बर्तन ऐसा ही जिसमें मुर्गियां आसानी से खा सकें लेकिन अनावश्यक बर्बादी या उनके अंदर गन्दगी न कर सकें। दाने का बर्तन साफ हो। दाने के साथ स्वच्छ पिने का ताजा पानी भी चूजों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करायें। पानी का बर्तन हमेशा साफ सुथरा रखें। पानी के बर्तन के आसपास अक्सर बिछावन गीला हो जाता है। अतः गीला बिछावन बदल दें। इस बात का ध्यान भी रखे की चूजे पानी को गन्दा न करें।
मुर्गियों के आहार में खाद्द पदार्थो का अनुपात :
मांस उप्तादन करने वाले चूजे जिसे ब्रायलर कहते हैं, तक़रीबन डेढ़ महीने में तैयार हो जाते हैं। इनके लिए दाना मिश्रण में तैयार हो जाते हैं।इनके लिए दाना मिश्रण बनाने के लिए मक्का, बाजरा, गेहूँ या सफ़ेद ज्वार ५१% मूंगफली या सोयाबीन की खल २३.५%,तिल या सूर्यमुखी की खल १०%,भुनी हुए ग्वार चुरी ५%, मछली या मांस का चुरा ८ तथा खनिज मिश्रण 2.५% मिलाकर १०० किलो दाना तैयार कर सकते हैं। इस दाना मिश्रण में विटामिन मिश्रण, एंटीबायोटिक व ककसिडियोस्टेट आदि आवश्यकता अनुसार दें; जैसे- बाइफूरान या एम्प्रोल ५० ग्राम, आरोफैक-१०, ६० ग्राम, रविमिक्स २५ ग्राम व रावी बी २५ ग्राम प्रति १००किलो दाने में मिलायें।
अंडे देने वाली मुर्गियों के लिए दाना मिश्रण उनके उम्र के हिसाब से देना पड़ेगा; जैसे- एक दिन से दो महीना के उम्र तक के चूजों के लिए दाना मिश्रण में मक्का,ज्वार,बाजरा या गेहूँ ३२%,मूंगफली या सोयाबीन की खाल २९.५%,चावल की पालिश २८%,मछली या मांस का चुरा ८% एवं खनिज मिश्रण २.५% मिलाएं। इसी तरह से बढवारी पठोरियों जिनकी उम्र दो से पांच महीने तक हो, के दाना मिश्रण में मक्का,ज्वार,बाजरा या गेहूँ २२%, मूंगफली या सोयाबीन की खल २०.५%,चावल की पालिश ३६%, गेहूँ का चोकर/छानस ८%,शीरा ५%,मछली या मांस का चुरा ६% एवं खनिज मिश्रण २.५% मिलायें।
पांच महीने के बाद मुर्गियां अंडे देना शुरू कर देती हैं। अतः इन मुर्गियों के दाना मिश्रण में मक्का,ज्वार,बाजरा या गेहूँ ३२%, मूंगफली या सोयाबीन का खल २१.५%, चावल या पालिश २९.५%, शीरा ५%, मछली या मांस का चुरा ५%, हड्डी का चुरा १%, चुने का पत्थर ३% एवं खनिज मिश्रण ३% मिलायें।
चूजे खरीदना :-
चूजे हमेंशा अच्छी नस्ल के ऐसी हैचरी से खरीदें जिनके चूजे सरकार द्वारा किये गये रैन्डम सैम्पल परिक्षण में खरे उतरे हों: ब्रायलर ६ सप्ताह की आयु में औसतन २ किलो दाना खाकर डेढ़ किलो वजन तक की हों जानी चाहिए। इस प्रकार अंडे देने वाली मुर्गियां प्रतिवर्ष २४०-३०० अंडे देने वाली हो।
अन्य जरुरी जानकारी :-
अच्छी नस्ल का चुनाव, समुचित आहार व्यवस्था व् प्रबंधन, रोगों से बचाव, उपचार व् नियंत्रण तथा सुनिश्चित विपणन से ही मुर्गीपालन लाभदायक हो सकता है। इलाज से बचाव बेहतर है। अतः स्थानीय पशुचिकित्सक की सलाह से मरैक्स, रानीखेत, गम्बोरो, चेचक, इंफैक्सीयस ब्रान्काइटस आदि बीमारियों से बचाव के लिए टीकाकरण करवाएं तथा किसी कारणवश पक्षियों में बीमारी आ जाती है तो तुरंत उसकी रोकथाम के लिए स्थानीय पशुचिकित्सक से संपर्क करें।
1. कुक्कुट आवास ऐसे स्थान पर बनाएं जहां वर्ष भर आवागमन के साधन उपलब्ध हों। मुर्गीघर मुख्य मार्ग या पक्की सड़क के निकट हो तथा अंडा/आहार लाने,ले जाने के लिए वाहन व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए।
2. फार्म शहर के निकट परन्तु घनी आबादी व शोर से दूर हो।
3. कुक्कुट आवास के लिए भूमि निचान में न हो और निकट में तालाब आदि न हो,न ही वहाँ पानी ठहरता हो।
4. पानी एवं बिजली की समुचित व्यवस्था हो।
5. मुर्गीघर लम्बाई में उत्तर दक्षिण दिशा में बनाएं।
6. मुर्गीघर हवादार हो। धुप व बारिश से बचने के लिए छज्जे लगे दरवाजे बाहर की और खुलने चाहिए, फर्श पक्का तथा दीवारों पर टीप या पलस्तर करना चाहिए। छत ऐसी बनाएं कि वर्षा का पानी उस पर न रुके। गर्मी में अधिक गर्म न हो तथा सर्दी में ठंडी न हो। पक्षियों को सर्दी व गर्मी से बचाने के लिए उचित व्यवस्था हो।
7. फार्म के निकट विपणन सुविधा हो।
8. रस्सी, बाल्टी, एग ट्रे आदि हर समय मुर्गीघर में उपलब्ध रखें।
9. समय-समय पर बिछावन को पलटने के लिए पंजा की व्यवस्था हो।
10. डीप लीटर में आवास स्थान २.२५ वर्ग फूट प्रति पक्षी अवश्य दें।
11. पिंजरा प्रणाली में प्रति पक्षी आवास सुविधा ०.७५ वर्ग फुट उपलब्ध करायें।
12. ८ सप्ताह तक के चूजों के पालन हेतु ७ वर्ग इंच स्थान, ९-२० सप्ताह के पक्षियों के लिए १ वर्ग फुट तथा अंडे देने वाली मुर्गियों को २ वर्ग फुट स्थान दें।
13. ५ सप्ताह की आयु पर चोंच काटें।
14. चूजे फार्म पर आने से पहले सभी उपकरण, ब्रूडर, गार्ड आदि का प्रबंध करें तथा तापक्रम नियमित करें। प्रकाश व्यवस्था भी ठीक रखें। प्रथम सप्ताह ९५ डिग्री फारनहाईट दें तथा बाद में प्रति सप्ताह ५ डिग्री काम करते जायें।
उपर्युक्त छोटी-छोटी परन्तु आवश्यक सुझावों को व्यावहारिक रूप में समझदारी के साथ प्रयुक्त करें तथा कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमायें।
प्रमुख बीमारियों एवं नियंत्रण :-
मुर्गे-मुर्गियों की अनेक बीमारियों है इन बीमारियों में कुछ एक की जानकारी कुक्कुट पालको को है, लेकिन कुछ ऐसे रोग हैं जिनसे कुक्कुट पालक प्रायः परिचित नहीं होते हैं। एक सफल कुक्कुट पालक को प्रत्येक प्रकार की व्याधियों से परिचित होना अपेक्षित है। सफल भाषा के नाम से तकनीकी शब्दों का सही रूप से प्रयोग नहीं करने के कारन विभ्रान्तियाँ पैदा होना स्वाभाविक है। लेकिन एकबार पशु पालक को किलष्ट कहे जाने वाले शब्दों से परिचित होने के पश्चात् वे सहज में उसे आत्मसात कर लेते हैं। यही कारण हैं कि पोस्टिसाईडस के इतने सख्त शब्दों का वे धार्राटे से प्रयोग करते हैं। प्रस्तुत है कुक्कुट जगत कि ऐसी बीमारियों जो कुक्कुट पालकों के लिए जानी अनजानी है।
संक्रमित पीनस :-
संक्रमित पीनस चूजों का ऐसा रोग है, जिसमें नाक तथा श्वास नलिका में रलेवमक निष्यन्त का होना, इसका चरित्रगत लक्षण है। यह रोग शेषप्रियाणु विष्किकीय प्रजाति के जीवाणुओं द्वारा होता है। ये जीवाणु प्रायः गले व नाक के प्रभाव में पाये जाते हैं। जीवाणु पक्षी के शरीर के बाहर अधिक समय तक जीवित रहने कि क्षमता नहीं रखते। इस रोग के लक्षण निम्न प्रकार हैं –
1. नाक के स्त्राव
2. चेहरे पर सोजिस
3. झींक आना
4. युजाको व (कन्जकटीवीटिस)
5. एक अथवा दोनों आंखों को बंद कर रखना व उनमें गीद आना।
6. नर पक्षियों के प्रवाट पर सोजिस आना और उनका आकर में बड़ा हुआ दिखाई देना।
7. रोगी द्वारा पानी एवं आहार कम ग्रहण करना|
इस रोग का सही निदान प्रयोगशाला में नाक व गले के प्रसव परिक्षण से भी संभव है।
शिथिल ग्रीव(बोटुलिगा) :-
इस रोग को बलवर परालारसिस लिम्बर नैक के नाम से भी उद्बोधित किया जाता है। यह रोग केवल चूजों का ही नहीं, अपितु अन्य पालतू पक्षियों को भी ग्रस्त करता है। यही नहीं मनुष्य एवं पालतू स्तनधारी पशु इस रोग से बचे हुए नहीं है।
यह रोग एक प्रकार का खाद्द विष है, जो कि सड़े, गले व गन्दीले आहार के खाने से होता है। संसर्ग से विजी उत्पादित करते हैं। क्योंकि कृ. गदाणु के अंडकोशक प्रायः मिटटी में रहते हैं, और सड़े-गले आहार के साथ मिल जाते हैं।
इस रोग के प्रभावी प्रतिकारक निम्न हैं –
1. सुप्रभाव्य पोषती – गाय, चूजा, बतख, मनुष्य आदि।
2. विषि मिश्रित आहार
3. गर्म एवं शुष्क वातावरण में क्षति अधिक।
इस रोग का अधिकांशतः फैलाव वहां मिलता है, जहां कि पक्षियों को सड़ा गाला आहार मिलता है। रोग का मुख्य लक्षण पक्षाघात का होना है। पैर एवं पंख सर्वप्रथम लकवे के चपेट में आते हैं। पक्षी चलने-फिरने में असमर्थ रहता है। मगर गर्दन की मांस पेशियों में लकवा हो जाता है तो पक्षी अपना सर पैर की ओर झुका देता है। इसी लक्षण के फलस्वरूप इस रोग को “लिम्बर नैक” के नाम से पुकारा जाता है। पक्षियों को ठन्डे एवं छायादार स्थानों में रखना चाहिए। सम्पूर्ण स्वच्छता इस रोग से सुरक्षा का बेहतर उपाय है।
संक्रमिक कंठ-श्वांसनाल कोप :-
यह एक तीव्र संक्रमिक रोग है जो कि बढ़ते हुए प्रौढ़ चूजों को ग्रस्त करता है। यह रोग जवान पक्षियों में अधिक खतरनाक होता है। यह रोग का कारण घावित विषाणु होते हैं, जिन्हें “टारपिया एवियन” के नाम से सम्बोधित किया जाता है। ये पावित विषाणु १५ मिनट में ५५ डिग्री सेंटीग्रेड ताप पर निष्क्रीय हो जाते हैं। इस रोग का संतृप्ति कल ६ से १२ दिन का है।

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