पशुओं में गर्भपात की समस्या

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पशुओं में गर्भपात की समस्या

पशुओं में गर्भपात एक ऐसी समस्या है जो न केवल पशुपालकों बल्कि बड़ी-बड़ी पशुशालाओं को भी आर्थिक रूप से काफी क्षति पहुंचा सकता है।
गर्भपात क्या है?
गर्भकाल पूरा होने से पहले ही गर्भस्थ बच्चे का गर्भाशय से बहार निकल जाना गर्भपात कहलाता है।
गर्भपात की समस्या से पशुपालकों को कैसे नुकसान होता है?
गर्भपात के कारन पशुपालकों को अत्यधिक आर्थिक नुकसान होता है।गर्भपात से न केवल नवजात शिशु कमजोर या मरा हुआ पैदा होता है अपितु जिस पशु का गर्भपात हुआ है उसे बच्चेदानी का रोग भी लग सकता है व उसकी जनन क्षमता भी कम हो जाती है।
गर्भपात के कारण क्या हैं?
गर्भपात के कारणों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला: संक्रामक कारण, दूसरा: गैर संक्रामक कारण।
संक्रामक रोग जिनके कारण पशुओं में गर्भपात होता है :-
1. जीवाणुजनित रोग :- ब्रुसेलोसिस, विब्रियोसिस,कलेमाइडियोसिस, लैप्टोसपाईरोसिस, लिसटिरियोसिस के कारण गर्भपात हो सकता है।
2. विषाणुजनित रोग :- जीवाणु व विषाणु रोगों के अलावा इक्वाईंन हरपिस वायरस-१ से घोड़ियों में तथा इंफैक्सियस बोवायन राईनोट्रेकाईटिस वायरस से गाय, भैंस में गर्भपात हो सकता है।
3. फफूंद रोग :- जैसे- एसपरजिलोसिस तथा टोक्सोपलाजमोसिस के कारण भी गर्भपात हो सकता है।
4. प्रोटोजोवा रोग :- ट्राइकोमोनियोसिस तथा टोक्सोपलाजमोसिस के कारण भी गर्भपात हो सकता है।
ये रोग गर्भपात के लिए खतरनाक होते हैं क्योंकि संक्रमण एक जानवर से दूसरे जानवरों में फ़ैल सकते हैं। यदि गर्भपात संक्रमण कारणों से होता है तो शेष पशुओं में भी संक्रमण तथा गर्भपात का खतरा बना रहता है।
1. पशुओं में गर्भपात के गैर संक्रामक के कारण :-
1. आहार में पोषक तत्वों की कमी :- पशु के शरीर में सभी तत्वों का संतुलित मात्रा में होना आवश्यक है। पोषक तत्वों की कमी संतुलित आहार न देने की वजह से होती है। कैल्शियम की कमी के कारण पशु पीछा दिखाना शुरू कर देता है तथा गर्भपात हो सकता है। विटामिन ए, आयोडीन की कमी से भी गर्भपात हो सकता है।
2. हारमोन स्तर में गड़बड़ी :- गर्भ के दौरान संतुलित हारमोन स्तर का होना अति आवश्यक है परन्तु इनकी कमी या अधिकता से गर्भपात हो सकता है। जैसा कि फास्फोरस की कमी के कारण प्रोजेस्ट्रान हारमोन भी कम हो जाता है। इस प्रकार प्रोजेस्ट्रान की कमी, इस्ट्रोजन तथा आक्सीटोसीन की अधिकता अधिकता गर्भपात का कारण हो सकती है।
3. विषैले पदार्थ :- कुछ हानिकारक पदार्थो के अचानक सेवन से भी गर्भपात हो जाता है; जैसे – नाइट्रोजन जहरवाद, कार्बन टेट्राक्लोराइड या कीटनाशकों के छिड़काव आदि से गर्भपात हो जाता है।
4. प्रतिकूल वातावरण :- जैसे- अधिक गर्मी व सर्दी से भी गर्भपात हो सकता है।
5. आनुवंशिक कारण :- अंतः प्रजनन के कारण भी गर्भपात हो सकता है। इसलिए हर तीन साल बाद अपने फार्म या गांव का सांड बदल लेने से इन समस्या का समाधान हो सकता है।
6. भौतिक कारण :- इन कारणों के अंतर्गत पशुओं को चोट पहुंचाने संबंधी कारण आते हैं; जैसे –
क) पशु का ऊंचाई से गिर जाना या खाई को लांघना।
ख) कुत्तों द्वारा ज्यादा दूर तक पीछा करना।
ग) काफी देर तक आपस में लड़ाई करना।
घ) दाहिने कोख में दूसरे जानवर द्वारा चोट पहुंचाना।
ङ) परिवहन के दौरान अधिक हिलना-डुलना।
च) संकरे रास्ते से गुजरना।
छ) अनियमित गर्भ परिक्षण तथा गाभिन पशु का बांझपन के लिए उपचार।
ज) अनियमित खान-पान।
झ) गर्भकाल की अंतिम अवस्था में टिका (वैक्सीन) लगना।
पशुपालन में क्या-क्या सावधानियां ध्यान में रखें जिनसे गर्भपात की समस्या की रोकथाम की जा सकें।
निम्नलिखित मुख्य सावधानियों को यदि पशुपालक ध्यान में रखेंतो गर्भपात की काफी हद तक रोकथाम की जा सकती है।
1. गर्भित पशुओं को,जहां तक संभव हो,उनके गर्भावस्था के अंतिम महीनों में दूसरे पशुओं से अलग रखना चाहिए।
2. इन पशुओं के रहने की जगह साफ-सुथरी,हवादार तथा रोशनी वाली होनी चाहिए।
3. गर्भित पशुओं को मुलायम,हरा तथा ठीक प्रकार से कटा चारा व साफ पानी देना चाहिए। चारे के साथ उचित मात्रा में खल, दाना और खनिज मिश्रण भी देने चाहिए।
4. इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि गर्भित पशु को ज्यादा भगाया या दौड़ाया न जाए।
5. पशु के स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए तथा प्रतिदिन यह देखते रहना चाहिए कि वह चारा ठीक प्रकार खा रहा है या नहीं। पशु कहीं सुस्त तो नहीं है या फिर कहीं उसको बुखार तो नहीं हो गया है। कहीं उसके योनि मार्ग से किसी प्रकार का स्त्राव तो नहीं हो गया है। कहीं उसके योनि मार्ग से किसी प्रकार का स्त्राव तो नहीं आ रहा है। इन सब अवस्थाओं में पशु-चिकित्सक को पशु को दिखाना चाहिए तथा उसके द्वारा दिए गए परामर्श तथा उपचार का पालन करना चाहिए।
6. यदि कोइ पशु गर्भकाल को पूरा होने से पूर्व ही ब्याने के लक्षण प्रदर्शित करता है तो उसको तुरंत पशु चिकित्सक को दिखाना चाहिए।
7. जिसका गर्भकाल हुआ हो उस पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए तथा गर्भपात हुए बच्चे तथा जेर का जानवर से अलग कर बाड़ें को अच्छी तरह साफ कर देना चाहिए। मरे हुए बच्चे का तथा जेर का पशु चिकित्सक से निरीक्षण करवाना चाहिए।
8. यदि पशु ८-१२ घण्टे तक जेर नहीं गिराता तो उसको पशु चिकित्सक को दिखना चाहिए।
9. गर्भपात हुए पशु के खून का परिक्षण आवश्यक होता है। इसके लिए जानवर का रक्त गर्भपात के तुरंत बाद तथा ३ सप्हत बाद निकल कर परिक्षण करवाना चाहिए।
10. जिस पशु का गर्भपात हुआ हो उसको तीन महीने तक न तो सांड से गर्भित करवाना चाहिए और न ही कृत्रिम गर्भाधान से, क्योंकि ३ महीने का आराम देने से पशु के ठीक प्रकार से गर्भित होकर स्वस्थ शिशु को जन्म देने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
गर्भपात की समस्या अपने देश के पशुओं में तो है ही पर आमतौर पर संकर पशु इस समस्या के अधिक शिकार होते हैं। संक्रामक रोग जैसे ब्रुसेलोसिस, विब्रियोसिस आदि के अतिरिक्त आहार में कुछ खास तत्वों की कमी, शरीर में हारमोन स्तर में गड़बड़ी और कभी-कभी पशु के रखरखाव व देखभाल में कमी भी पशुओं में गर्भपात का कारण बन जाती है। कुछ सावधानियों को ध्यान में रखने पर गर्भपात की समस्या की रोकथाम की जा सकती है।

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