पशुओं के मुख्य आतंरिक व बाह्य परजीवी रोग

पशुओं में गर्भपात की समस्या
July 9, 2018
जीव विज्ञान (Biology)
July 10, 2018

पशुओं के मुख्य आतंरिक व बाह्य परजीवी रोग

परजीवी वह जीव होता है जो अपने रहने व खाने के लिए दूसरे जीव के अंदर या ऊपर(बहार) व उस पर निर्भर करता है। परजीवी मेजबान की प्रकार से अलग प्रकार का होता है। पशु के शरीर के अंदर या ऊपर रहने के आधार पर परजीवी निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं –
1. आतंरिक परजीवी :- वह परजीवी जो पशु के शरीर के अंदर रहते हैं; जैसे – कि जूंण|
2. बाह्य परजीवी :- वह परजीवी जो पशु के शरीर के अंदर रहते हैं; जैसे – कि चीचड़ीयां|
नीचे पशुओं के मुख्य आतंरिक परजीवी जूंण व बाह्य परजीवी चीचड़ियों के बारे में जानकारी कि गई है।
1. गाय व भैंस के शिशुओं में जूंण रोग व उपचार :-
हरियाणा भर में नवजात गाय या भैंस के शिशुओं में जूंण रोग पाया जाता है। इसका प्रकोप देसी नस्ल की गायों की संतान की अपेक्षा भैंस के कटड़े-कटड़ियों व संकर नस्ल के बछड़े-बछड़ियों में अधिक है।लगभग ९०% कटड़े-कटड़ियों इससे ग्रस्त होते हैं। यदि उचित देखभाल व इलाज न किया जाए तो मृत्युदर काफी ऊंची हो सकती है। हरियाणा में मुर्राह नस्ल की अच्छी भैंस पाई जाती है। मुर्राह की कटड़ी तीन से साढ़े तीन साल के भीतर दुधारू झोटी बन जाती है। जिसकी कीमत १५००० रुपये से ज्यादा है। इसी प्रकार स्वस्थ कटड़ा भी एक साल बाद १००० से ज्यादा का बिकता है। अतः कटड़े या कटड़ी की बचपन में मृत्यु किसान के लिए काफी नुकसानदायक होती है और प्रदेश की आमदन को भी भरी नुकसान उठाना पड़ता है।
जूंण सफ़ेद रंग के गोल कृमि होते हैं जो १५ सेंटीमीटर से ३१ सेंटीमीटर तक लम्बे हो सकते हैं। मादा जूंण नर जूंण की अपेक्षा लम्बी होती है। लगभग सभी जानवरों में जुंड़ों को जीवन चक्र एक जैसा है।अंत में विद्यम व्यस्क जूंण अंडे देती है जो रेट में पांच साल तक भी कारगर रहते हैं। संक्रमण चारे-पानी के साथ होती है। अंत में आने पर शीघ्र ही लार्वा बाहर आ जाता है। इस प्रकार पैदा हुए कई लाखों आंत को पर कर खून में मिल जाते हैं व खून द्वारा ये पहले जिगर में व फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। फेफड़ों से ऊपर ये श्वास नाली में चढ़ जाते हैं व् भोजन नाली के द्वार पर पहुंच कर एक बार फिर निगल लिए जाते हैं और फिर आंत में पहुंच जाते हैं।
अंडे की संक्रमण से लारवे आंत में पहुंचने का सफर तीन से चार सप्ताह का होता है। पांच सप्ताह पश्चात् ये लारवे वयस्क हो जाते हैं व् अंडे देने शुरू कर देते हैं। गाय व भैंस में गर्भ के दौरान भी संक्रमण संभव है। यही कारण है की एक महीने की उम्र से पहले भी भैंस के कटड़ी-कटड़ी में वयस्क जूंण निकलते हैं।
जूंण से ग्रसित गाय व भैंस शिशुओं का वजन उचित मात्रा में नहीं बढ़ता। वे कमजोर प्रतीत होते हैं। कभी दस्त लगते हैं तो कभी कब्ज रहती है। कई बार पेट में दर्द होता है। चमड़ी खुरदुरी व बेजान सी लगती है। बालों में चमक नहीं रहती। कई बार हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि ग्रसित कटड़ा-कटड़ी जमीन पर पसर जाता है व उसका उठना असंभव हो जाता है, गर्दन अकड़ जाती है। यह बड़ी गंभीर स्थिति होती है। कई नवजातों में निमोनिया भी साथ हो जाता है।
बचाव व इलाज :-
कहते हैं कि बचाव इलाज से अच्छा हैं, किन्तु जूंण के मामले में हम कह सकते हैं कि इलाज बचाव से अच्छा है। भैंस के नवजात में १५ दिन व डेढ़ महीने पर कृमिनाशक फवा पिलाने से लगभग सभी कटड़े-कटड़ियां इसके प्रकोप से बचे रहते हैं व मृत्यु न के बराबर है। पिपराजीन दवाई का प्रयोग बेहतर होता है। जिसे २०० मिलीग्राम/कि.ग्रा. शरीर वजन पर सुरक्षित रूप से दिया जा सकता है। इलाज के लिए अलबैंडजोल, फैनबैंडजोल व आइवरमैक्टिन का प्रयोग भी किया जा सकता है। जिस जानवर को कब्ज हो उसका पहले अनीमा कर कब्ज तोड़ना चाहिए, तत्पश्चात ही दवाई देनी चाहिए। दवाई देने के १-२ घंटे बाद ५० मिलीलीटर सरसों का तेल पिलाना चाहिए।
2. पशुओं में चीचड़ियों की रोकथाम व उपचार :-
थोड़ी बहुत चीचड़ीयां तो पशुओं में हर समय लगी रहती हैं परन्तु मार्च से लेकर अक्टूबर तक इनका प्रकोप बहुत बढ़ जाता है। देखने में आया है कि यदि किसी पशु को १०० चीचड़ीयां लगी हों तो वे सब मिलकर १०० ग्राम खून प्रतिदिन चूस सकती हैं।
रोकथाम :-
पशुशाला में चीचड़ीयां का जीवन-चक्र ऐसा है कि वे अण्डे देने के लिए पशु को छोड़कर पशुशाला में जहां कूड़ा-कर्कट हो या छेदों आदि में छिपाकर अण्डे देती हैं। ये अण्डे हजारों संख्या में होते हैं तथा कुछ दिन पनपने के बाद ही वहां से हटकर अगली अवस्था के रूप में अन्य पशुओं में लग जाते हैं। इसलिए पशुपाला को हमेशा साफ रखें तथा जहां तक हो सके पशुशाला में छिद्र या दरारें न रहने दें। पशुशाला को एक प्रतिशत मैलाथियान या सुमिथियान व अन्य कीटनाशक से अच्छी तरह धोएं। अप्रैल से अक्टूबर के बीच ऐसा हर १५ दिन बाद करने से चीचड़ीयां काफी काम हो जाएंगी।
नए पशुओं का पशुपालन में प्रवेश :-
नए पशुओं को पुराने पशुओं के साथ पशुशाला में बांधने से पहले अच्छी तरह देश लें कि उन पर चीचड़ तो नहीं लगे हैं यदि ऐसा है तो उन पर मैलाथियान या सुमिथियान या सेविन या अन्य कीटनाशकों के घोल का छिड़काव करें।
चरागाह का बदलना :- जिन पशु पालकों के पशु बाहर चारागाह में चरने जाते हैं उन्हें थोड़े दिनों बाद चारागाहों को बदलते रहना चाहिए क्योंकि खून चूसने के बाद चीचड़ पशु को छोड़कर नीचे जमीन पर पनपते हैं और अगली अवस्था में बदलने पर अन्य पशु कि तलाश में रहते हैं। यदि उन्हें समय पर पशु नहीं मिले तो कुछ समय पश्चात् वे स्वयं ही मर जाएंगे या कहीं और चले जाएंगे। चारागाह में जहां तक हो सके झाड़ियां इत्यादि न हों क्योंकि ज्यादातर चीचड़ियों के लरवों इन्हीं पर रहते हैं।
कुत्तों में :- प्रायः देखने में आया है कि कुत्ते बाहर से चीचड़ीयां लाने में सहायक होते हैं इसलिए जिन पशु पालकों ने कुत्ते पाल रखे हों वे उन्हें पशुशाला से अलग रखें और उन पर चीचड़ीयां न रहने दें।
यदि चीचड़ियां कम हों तो उन्हें हाथ से निकल लें व मार डालें या जमीन में दवा दें। परन्तु जब संख्या बहुत अधिक हो तो निम्नलिखित दवाओं का प्रयोग किया जा सकता है :-
मैलाथियान ०.५-१.०% घोल, बुटोक्स ०.३%, सिप्रोल ०.१% इनमें से किसी भी दवाई को पाने में मिलाकर तथा उचित मात्रा में घोल बनाकर प्रैशर स्प्रे पंप से छिड़काव करना चाहिए। वैसे तो पुरे शरीर पर छिड़काव करना चाहिए। वैसे तो पुरे शरीर पर छिड़काव करना चाहिए परन्तु कान, पूंछ, अगले और पिछले पैरों के बीच तथा हवाना(ल्योटी) के पास अच्छी तरह छिड़काव करना चाहिए। हर २-३ सप्ताह बाद छिड़काव करते रहना चाहिए जब तक कि सभी चीचड़ियां ख़त्म न हो जाएं।
प्रायः सभी दवाई जो चीचड़ियां मारने के लिए प्रयोग की जाती हैं, जहरीली होती हैं। इसलिए उनका प्रयोग करते से पहले पशु चिकित्सक का परामर्श अवश्य लें तथा निम्नलिखित सावधानियां बरतें :-
ध्यान रहे कि दवाई चारा, पानी आदि में न मिलने पाए। बछड़ों के मुंह पर पर छिका बांध दें जिससे वो दवाई न चाट सकें। छिड़काव करते समय पशुओं कि आंखों को बचाना चाहिए। दूध निकालने से पहले ल्योटी अच्छी तरह से साबुन और गर्म पानी से धो लें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *