अधिक ऊर्जा देने वाली उपयोगीय कंदीय फसल शकरकंद

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अधिक ऊर्जा देने वाली उपयोगीय कंदीय फसल शकरकंद

यह एक सस्ती, उपयोगी व आलू के समान अधिक ऊर्जा देने वाली कंदीय फसल है। इसका उपयोग उबाल कर किया जाता है। मांड(स्टार्च) की मात्रा अधिक होने के साथ ही इसमें २३% अल्कोहल तैयार करने वाला भाग है। यह सूखे की स्थिति में महत्वपूर्ण खाद्द पदार्थ है इसकी निम्नलिखित प्रस्तावित कृषि कार्यमाला है।
भूमि :- रेतीली दोमट व दोमट भूमि, जहां पानी का निकास अच्छा हो, अधिक उपयुक्त है। भूमि का पीएच ५.८ से ६.७ होना चाहिए। भूमि को अच्छी तरह जुताई कर बखर चला कर भुरभुरी करना चाहिए।
उन्नत प्रजातियां :-
पूसा लाल :- इसके कंद लाल व बड़े आकर के होते हैं। फसल लगाने के १६०-१७० दिन बाद खोदने हेतु तैयार हो जाती है। उपज १२५-१४० किवंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।
पूसा सफ़ेद :- कंद सफ़ेद व बड़े आकार के होते हैं। यह १३५-१४० दिन में खोदने के लिए तैयार हो जाती है। उपज १७५-१९० क्विंटल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है।
जेबीआईबी -१४५ :- कंद मीठा, गूदे दर हल्का पीला व इसकी त्वचा सुनहरे रंग की होती है। यह १३५-१५० दिन में तैयार हो जाती है। उपज २५०-३०० क्विंटल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है।
जेईबी -११४ :- कंद बड़ा, लाल रंग का तथा गूदेदार होता है। इसमें स्टार्च की मात्रा २५% तथा शुगर १२% तक होती है। फसल २५०-२७० क्विंटल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है। फसल अवधि १०५-११० दिन है।
संकर प्रजातियां :-
एच ४१ :- इसे मध्य भारत में अक्टूबर में लगाया जा सकता है। यह तीन साढ़े तीन माह में तैयार हो ताजी है। कंद का वजह ३००-५०० ग्राम तक होता है। कंद २७-३० से.मी. तक लम्बे तथा १५-२० से.मी. चौड़े होते हैं। उपज २७० क्विंटल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है।
एच-४२४ :- यह मध्यम आकार की एवं छिलका गुलाबी रंग का होता है। गुदा सफ़ेद रंग का होता है। भण्डारण क्षमता अधिक है। कंदों पर कीड़ों का प्रकोप भी कम होता है।
पौध की मात्रा :- प्रति हेक्टर ४५,००० कलम पर्याप्त है।
लगाने का समय :- जून- जुलाई तथा अक्टूबर-नवम्बर।
लगाने की विधि :- कलमों को समतल खेल अथवा मेढ़ों पर लगाते हैं। कलम को कता से कता में ६० से.मी. तथा कलमों को ३० से.मी. की दूरी पर लगाते हैं। प्रत्येक कलम में कम से कम ४ गांठे होना चाहिए। रोपाई इस प्रकार करें कि दो गांठ जमीन के अंदर व दो ऊपर होनी चाहिए।
खाद व उर्वरक :- गोबर खाद २० टन, नत्रजन ६० किलो, स्फुर ४० किलो व पोटाश २० किलो प्रति हेक्टर कि दर से देना चाहिए। गोबर कि खाद, स्फुर व पोटाश कि पूरी मात्रा तथा नत्रजन कि एक तिहाई मात्रा खेत कि तैयारी करते समय मिलाना चाहिए। नत्रजन कि शेष मात्रा क्रमशः ३० तथा ४५ दिन बाद देना चाहिए। रासायनिक खाद भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों कि उपलब्धता अनुसार कम अथवा अधिक मात्रा में दे सकते हैं।
मिटटी चढ़ाना :- अच्छी फसल के लिए मिटटी चढ़ाने कि क्रियाओं को अपनाना चाहिए। दो माह के अंतर से मिटटी चढ़ाना चाहिए।
निंदाई :- जब भी खेत में खरपतवार हो उनको निंदाई करके अलग करना चाहिए।
सिंचाई :- कलमों को लगाने के तुरंत बाद सिंचाई करना चाहिए। इसके बाद आवश्यकता अनुसार १५ दिन के अंतर से सिंचाई करते रहना चाहिए।
खुदाई :- जब शकरकंद को तोड़ने से दूध न निकले तो यह समझें कि फसल खोदने हेतु तैयार है। खोदने के बाद बेचा जा सकता है अथवा करीब एक सप्ताह छाया में साफ करके सुखाना चाहिए तत्पश्चात संग्रह करें।
उपज :- औसत पैदावार १७५-२४० क्विंटल प्रति हेक्टयर तक प्राप्त होती है।

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